रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में हालात कुछ अलग ही नजर आ रहे हैं। एक ओर, छात्र हैं जो हजारों की संख्या में बैठे हैं, उनके चेहरे पर थकान और आंखों में गुस्सा है। दूसरी ओर, एक अन्य मंच पर राजनीतिक दलों के सदस्य जुटे हुए हैं, उनके हाथों में झंडे और बैनर हैं। सभी की मांगें और नारें समान हैं, लेकिन बैठने की जगहें अलग हैं। छात्रों का कहना है, “यह हमारी लड़ाई है, इसमें किसी पार्टी का दखल नहीं होना चाहिए।” यह तस्वीर झारखंड में भर्ती परीक्षा से जुड़ी एक बड़े आंदोलन की है, जो पिछले एक हफ्ते से रांची की सड़कों पर छाया हुआ है।

यह आंदोलन झारखंड की भर्ती परीक्षा प्रणाली में उठे बड़े सवालों का परिणाम है।

आंदोलन की शुरुआत

19 अप्रैल को झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) ने 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का आयोजन किया था। परिणाम जुलाई की शुरुआत में घोषित किए गए, और तभी एक OMR शीट वायरल हो गई, जिसमें बताया गया कि सुमन सौरव नामक एक अभ्यर्थी ने केवल 48 सवालों के जवाब देकर परीक्षा पास की। इसी वायरल दस्तावेज ने छात्रों में नाराजगी को जन्म दिया, और यह एक छोटे से विरोध को बड़े आंदोलन में बदलने का कारण बना।

गुस्से का विस्तार

5 जुलाई को छात्रों ने अपने विरोध की औपचारिक शुरुआत की।

7 जुलाई को, एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की और अपनी शिकायत दर्ज कराई।

8 जुलाई को, आयोग के खिलाफ पुतला फूंका गया।

20 जुलाई को छात्रों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात की और इस मामले के सबूत प्रस्तुत किए, जिसके बाद सरकार ने जांच का आश्वासन दिया।

25 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे नीट पेपर लीक आंदोलन ने झारखंड के छात्रों में नई ऊर्जा भर दी।

29 जुलाई को बापू वाटिका से अल्बर्ट एक्का चौक तक मार्च निकाला गया, जहां छात्रों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़ी और राष्ट्रगान गाया, और इसके साथ ही अनिश्चितकालीन सत्याग्रह की शुरुआत की।

31 जुलाई को झारखंड सीआईडी ने जांच आगे बढ़ाते हुए वायरल OMR शीट वाले सुमन सौरव समेत लगभग 10 लोगों को गिरफ्तार किया।

2 अगस्त को आंदोलन अपने पांचवे-छठे दिन में पहुंच गया, जब दिल्ली से CJP के नेता छात्रों के समर्थन में आए।

छात्रों की मांगें

छात्रों की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  • 19 अप्रैल की 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा को रद्द किया जाए।
  • राज्य की CID जांच से छात्र असंतुष्ट हैं और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं।
  • OMR शीट में “अनअटेम्प्टेड” विकल्प जोड़ा जाए।
  • परीक्षा के विभिन्न चरणों के लिए अलग-अलग एजेंसियों को नियुक्त किया जाए।
  • भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध किया जाए और दोषियों को कड़ी सजा दी जाए।

राजनीति और छात्रों का अलगाव

यहां पर एक दिलचस्प स्थिति सामने आई है। आंदोलन के प्रमुख नेता देवेंद्रनाथ महतो लंबे समय से झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (JSSU) के जरिए भर्ती और आरक्षण के मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं, लेकिन वे झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) से भी जुड़े हुए हैं। जैसे ही उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की, सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि उन्हें मीडिया द्वारा “छात्र नेता” के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि वे एक राजनीतिक दल के नेता हैं।

वहीं, छात्रों के समूह, जैसे “JSSC-JPSC भ्रष्टाचार मुक्त अभियान” और “JPSC-JSSC कैंडिडेट्स जस्टिस फोरम” ने स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन पूरी तरह से गैर-राजनीतिक है। उनका मानना है कि यह मामला छात्रों के भविष्य से संबंधित है और अगर इसे किसी पार्टी के बैनर के तहत लिया गया, तो असली मुद्दा विवाद में पड़ सकता है।

इस प्रकार, स्थिति असामान्य लेकिन स्पष्ट हो गई है। मुद्दा एक है, नारें समान हैं, लेकिन मंच अलग हैं। छात्र अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने पर जोर दे रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन केवल रांची में ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे झारखंड के सभी 24 जिलों तक फैलाया जाएगा। धरनास्थल पर बैठे अधिकांश छात्र किसान परिवारों से हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं। राज्य सरकार अभी भी CID जांच पर अड़ी हुई है, जबकि छात्र इससे संतुष्ट नहीं हैं।