पूर्वी सिंहभूम: ग्रामीणों ने खुद बनाई सड़क, प्रशासन की अनदेखी पर उठाया कदम

पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा प्रखंड स्थित कासमार पंचायत के गोलकाटा गांव के निवासियों ने अपनी स्थिति के प्रति असंतोष जताते हुए खुद ही एक किलोमीटर लंबी जर्जर सड़क का निर्माण किया है। यह सड़क गोलकाटा और बलियागोड़ा गांवों को जोड़ती है, लेकिन वर्षों से इसकी खराब स्थिति ने ग्रामीणों को खुद मोर्चा संभालने के लिए मजबूर कर दिया। बारिश के मौसम में यह सड़क और भी बदतर हो जाती थी, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

ग्रामीणों की परेशानियों का कारण

गोलकाटा गांव की यह मुख्य सड़क, जो 2014 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई गई थी, ग्रामीणों को गोपालपुर और कटिंग के माध्यम से जमशेदपुर और पुरुलिया जैसे प्रमुख शहरों से जोड़ती है। कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों को सड़क की खराब स्थिति के बारे में सूचित किया गया, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन मिला। स्थायी मरम्मत या ठोस योजना का कोई असर नहीं दिखा।

स्कूली बच्चों और किसानों पर प्रभाव

इस खराब सड़क का सबसे गंभीर प्रभाव स्कूली बच्चों, स्थानीय ग्रामीणों, किसानों और राहगीरों पर पड़ा है। बच्चों को इस जर्जर मार्ग से स्कूल जाना पड़ता है, जहां कीचड़ और गड्ढों के कारण हर कदम पर दुर्घटना का खतरा बना रहता है। बारिश के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, लेकिन प्रशासन की ओर से इसे नजरअंदाज किया जाता रहा है।

ग्रामीणों की सामूहिक पहल

उपेक्षा और बढ़ती परेशानियों के बीच ग्रामीणों ने सामूहिक निर्णय लिया कि अब इंतजार नहीं किया जाएगा। उन्होंने अपने सामर्थ्य के अनुसार श्रमदान किया और सड़क की मरम्मत का कार्य शुरू किया। कुछ ग्रामीणों ने कुदाल उठाई, जबकि अन्य ने मलबा और पत्थर इकट्ठा किए। यह कार्य किसी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि प्रशासन की अनुपस्थिति के खिलाफ एक मौन प्रतिरोध था। उन्होंने इसे सरकारी अनुपस्थिति की भरपाई माना, जिससे सड़क चलने लायक बन सके।

जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी

ग्रामीण मुकेश कुंभकार ने बताया कि इस रास्ते से किसान और स्कूली बच्चे प्रतिदिन आवागमन करते हैं, लेकिन सड़क की खराब स्थिति के कारण उन्हें बार-बार दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों को बार-बार इस समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन कोई ठोस पहल नहीं की गई। इससे ग्रामीणों में उपेक्षा की भावना बढ़ गई है।

भविष्य की उम्मीदें

ग्रामीणों के श्रमदान के बाद अब इस सड़क को गिट्टी, बालू और सीमेंट से मजबूत बनाया गया है। वर्षों की उपेक्षा के बावजूद गांव के लोगों ने अपने स्तर पर सड़क को संभाला है, जिससे उन्हें थोड़ी राहत मिली है। हालांकि, यह सवाल अब भी बना है कि क्या प्रशासन हमेशा ऐसे ग्रामीणों की मेहनत पर निर्भर रहेगा। ग्रामीण अब भी पक्की सड़क और नियमित रखरखाव की उम्मीद लगाए बैठे हैं।