नेमरा में शोक: आदिवासी नेता शिबू सोरेन का निधन

5 अगस्त 2025 को नेमरा की धरती शोक में डूबी रही। 4 अगस्त को झारखंड के प्रतिष्ठित नेता शिबू सोरेन का निधन हुआ, जो आदिवासी समुदाय की आवाज बने थे। इस दिन नेमरा के इतिहास में एक दुखद तारीख के रूप में दर्ज किया जाएगा। हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए एकत्रित हुए, और नेमरा में तिरंगे में लिपटी उनकी पार्थिव देह को देखकर हर आंख नम थी। न केवल झारखंड, बल्कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, और छत्तीसगढ़ से भी लोग नेमरा पहुंचे, जहां शिबू सोरेन ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग बिताया।

शिबू सोरेन का प्रारंभिक जीवन

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को नेमरा गांव में हुआ। उनके पिता, मास्टर सोबरन सोरेन, एक शिक्षक थे और घर में शिक्षा का माहौल था। शिबू ने अपने बचपन में सही-गलत, न्याय-अन्याय और हक-हकूक की बातें सुनीं। उनके पिता ने उन्हें समाज में व्याप्त अन्याय के खिलाफ खड़े होने का पाठ पढ़ाया। हालांकि, सोबरन सोरेन को इस जागरूकता की कीमत चुकानी पड़ी, जिसका प्रभाव शिबू के जीवन पर गहरा पड़ा।

धनकटनी आंदोलन की शुरुआत

महाजनों द्वारा आदिवासियों की जमीन हड़पने की घटनाओं के खिलाफ 18 साल की उम्र में शिबू सोरेन ने 1960 के दशक में संताल नवयुवक संघ का गठन किया। उन्होंने धनकटनी आंदोलन की शुरुआत की, जिसमें वे गांव-गांव जाकर आदिवासियों को जागरूक करते थे। शिबू ने उन्हें बताया कि उन्हें अपनी जमीन पर अपना हक नहीं छोड़ना चाहिए और महाजनी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। उनकी सक्रियता ने आदिवासी समुदाय में साहस और हिम्मत का संचार किया, जिससे उन्हें अपने हक और अधिकार मांगने की प्रेरणा मिली।