देवघर के डे-बोर्डिंग बालिका फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र की आदिवासी खिलाड़ियों ने अपनी समस्याएं मुख्यमंत्री तक पहुंचाई, जिसका परिणाम उन्हें अधिकारियों के गुस्से का सामना करना पड़ा। खेल विभाग ने इस मामले में अधिकारियों को समस्याएं दूर करने का निर्देश दिया, लेकिन इसके बजाय खिलाड़ियों को बुलाकर इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि उन्होंने सीधे सीएम को शिकायत क्यों की।

इन खिलाड़ियों ने आरोप लगाया है कि उन्हें प्रशिक्षण के बजाय मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है और जाति सूचक अपशब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि जिला खेल अधिकारी (डीएसओ) ने पुराने खिलाड़ियों को हटाने और प्रशिक्षण केंद्र को बंद करने की धमकी दी है। खिलाड़ियों का कहना है कि उनके आने के बाद से एससी-एसटी वर्ग की खिलाड़ियों को धीरे-धीरे केंद्र से बाहर किया जा रहा है और उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की जा रही हैं।

खिलाड़ियों ने बताया कि 25 खिलाड़ियों की क्षमता वाले इस केंद्र में केवल 14 खिलाड़ी ही प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं, जबकि 11 सीटें खाली हैं। फिर भी नए खिलाड़ियों का चयन नहीं किया जा रहा है। कोच ने कई बार पत्र लिखने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इसके अलावा, खिलाड़ियों ने यह भी बताया कि पिछले 16 महीने से उन्हें छात्रवृत्ति नहीं मिली है। जब उन्होंने इस विषय में डीएसओ से बात की, तो उन्हें सेंटर से बाहर निकालने की धमकी दी गई।

जांच का आदेश, लेकिन उचित कार्रवाई का अभाव

खिलाड़ियों की शिकायत के बाद जांच का आदेश दिया गया था, लेकिन उपविकास आयुक्त के कार्यालय में जांच के नाम पर खिलाड़ियों और प्रशिक्षक को डांटा गया। एक खिलाड़ी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें कहा गया कि आवेदन में लगाए गए आरोपों को हटाकर अपना पक्ष दोबारा लिखकर जमा करें।

उपविकास आयुक्त ने अपनी खेल ज्ञान की कमी का हवाला देते हुए डीएसओ को बुलाया और पूरी बातचीत के दौरान डीएसओ की बातें सुनीं। छात्रवृत्ति नहीं मिलने के लिए प्रशिक्षक को जिम्मेदार ठहराया गया, जबकि खिलाड़ियों की सभी बातें अनसुनी कर दी गईं। यह स्पष्ट है कि जिनके खिलाफ जांच होनी थी, वही अप्रत्यक्ष रूप से पूरी प्रक्रिया का संचालन कर रहा था। जिले के आलाधिकारियों के व्यवहार ने महिला खिलाड़ियों की समस्याओं को और बढ़ा दिया है।