स्टेन स्वामी: पांच साल बाद भी अनसुलझे सवाल
5 जुलाई 2021 को 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी ने मुंबई के एक अस्पताल में अपनी आखिरी सांस ली। उनकी मृत्यु को आधिकारिक रूप से इलाज के दौरान हुई घटना माना गया, लेकिन वे उस समय न्यायिक हिरासत में थे। उनके समर्थक इसे “कस्टोडियल डेथ” मानते हैं, जबकि सरकारी एजेंसियां इसे न्यायिक प्रक्रिया के दौरान हुई मृत्यु के रूप में देखती हैं।
स्टेन स्वामी की पहचान
पांच साल बाद भी स्टेन स्वामी की पहचान पर सवाल उठता है। अगर कोई युवा उनसे जुड़ी जानकारी चाहे, तो हमें क्या बताना चाहिए? क्या यह कहना सही होगा कि वे देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और माओवादी संगठन से जुड़े थे, या यह कि उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा झारखंड के आदिवासियों और विस्थापितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बिताया?
झारखंड में सक्रियता
स्टेन स्वामी 1970 के दशक से झारखंड में कार्यरत थे, और रांची में स्थित बगइचा उनके कार्य का प्रमुख केंद्र बना। उन्होंने पेसा कानून, भूमि अधिग्रहण, और आदिवासी स्वशासन के मुद्दों पर काम किया। उन्होंने झारखंड की जेलों में बंद हजारों अंडरट्रायल आदिवासियों पर अध्ययन किया और यह सवाल उठाया कि जिनका मुकदमा पूरा नहीं हुआ, वे वर्षों तक जेल में क्यों रह रहे हैं।
भीमा कोरेगांव मामला
भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में, 8 अक्टूबर 2020 को एनआईए ने उन्हें गिरफ्तार किया था। उन पर कई गंभीर धाराएं लगाई गई थीं, जिनमें IPC की धारा 120B, 121, 121A, 124A और UAPA शामिल थीं। एजेंसी ने आरोप लगाया कि उनका संबंध प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) से था।
अदालत के सामने स्थिति
स्टेन स्वामी ने सभी आरोपों से इनकार किया और कहा कि वे कभी भीमा कोरेगांव नहीं गए। उनके स्वास्थ्य की स्थिति को लेकर कई बार जमानत मांगी गई, लेकिन उन्हें इलाज के लिए भी समय पर जमानत नहीं मिली। अंततः 5 जुलाई 2021 को उनकी मृत्यु हो गई, जबकि अदालत ने उन्हें किसी भी आरोप में दोषी नहीं ठहराया था।
कानूनी दृष्टिकोण
भारतीय कानून के अनुसार, आरोपी और दोषी एक समान नहीं होते। गिरफ्तारी का मतलब यह नहीं होता कि व्यक्ति अपराधी है। यह स्थिति स्टेन स्वामी के मामले को अधिक जटिल बनाती है। उनकी मृत्यु पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विशेषज्ञों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई।
समाज में बहस
बाद में डिजिटल फॉरेंसिक कंपनी Arsenal Consulting की रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि कुछ आरोपियों के कंप्यूटर में बाहरी हस्तक्षेप हुआ। हालांकि, जांच एजेंसियों ने इन निष्कर्षों को मानने से इनकार किया। पांच साल बाद भी यह मामला भारतीय लोकतंत्र के लिए कई जटिल प्रश्न छोड़ता है।
नैतिक प्रश्न
क्या एक 84 वर्षीय गंभीर रूप से बीमार अंडरट्रायल को चिकित्सा आधार पर जमानत मिलनी चाहिए थी? क्या गंभीर आरोपों वाले मामलों का समयबद्ध ट्रायल होना आवश्यक नहीं है? क्या जांच एजेंसियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए?
भविष्य की पीढ़ियों के लिए सवाल
अगर भविष्य की पीढ़ी केवल एक पंक्ति में पूछे कि स्टेन स्वामी कौन थे, तो क्या हम उन्हें सिर्फ “UAPA आरोपी” कहेंगे, या “आदिवासी अधिकारों के लिए समर्पित कार्यकर्ता”? या फिर हम उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित करेंगे जिन पर गंभीर आरोप लगे थे, जिन्होंने अंत तक अपनी बेगुनाही का दावा किया, और जिनकी मृत्यु बिना दोष साबित होने के पहले हुई।
स्टेन स्वामी का मामला केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि न्याय, प्रक्रिया और राज्य की जवाबदेही के मुद्दों पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है।
